Full width home advertisement

Internet

Biography

Post Page Advertisement [Top]

नमस्कार दोस्तों हाजिर हुआ  हूँ  एक नयी इंटरेस्टिंग पोस्ट के साथ में आशा करता  हूँ यह पोस्ट आपको बहुत पसंद और आपके जीवनकाल में काम आएगी आज का हमारा टॉपिक है पुलिस और कानूनी अधिकार क्या है हमे अपने कानूनी अधिकार मालूम होने चाहिए यह हमारी जनरल नॉलेज और ज़िन्दगी में काम भी आ सकते है तो आज हम विस्तार से पढ़ते है की पुलिस और कानूनी अधिकार क्या है आईये दोस्तों जानते है 


कानूनी अधिकार क्या है?, पुलिस का क्या काम होता है,   पुलिस अगर आपको कर रही हो गिरफ्तार , 16 कानूनी अधिकार जो हर भारतीय को, अपने अधिकार जानिये, क्या पुलिस को मारने का अधिकार है?,  पुलिस कब गिरफ्तार कर सकती है?,  पुलिस पूछताछ क्या है?,  कानूनी अधिकार क्या है?, कानूनी अधिकार क्या है,  पुलिस बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं,  पुलिस पूछताछ क्या है.  पुलिस का क्या काम होता है, dailyhindipost.com



1. पुलिस कौन है?

पुलिस एक ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिनका चयन और प्रशिक्षण कानून और व्यवस्था तथा जनता की सुरक्षा और सेवा के लिए किया जाता है ।


2. पुलिस के काम :-

  • कानून और व्यवस्था बनाए रखना
  • अपराध का निवारण करना
  • अपराध की जांच करना
  • संज्ञेय अपराध करने वाले अभियुक्त की गिरफ्तारी करना
  • किसी व्यक्ति के जान, माल औऱ आजादी की सुरक्षा करना
  • किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए हर कानूनी आदेश और वारंट को निष्पादित करना

3. पुलिस का प्रशासनिक ढांचा :-

  • एसएचओ (पुलिस थाने का इंचार्ज होता है )
  • डीएसपी (सब डिविजन का पुलिस अधिकारी होता है जबकि मेट्रोपोलिटन शहरों में असिस्टेंट कमिश्नर कहा जाता है ,एसएचओ के काम की देखरेख करता है)
  • एसपी (एक जिले की कानून और व्यवस्था में डीएम की मदद करता है)
  • एसएसपी(एक जिले के पुलिस प्रशासन का इंचार्ज होता है , जो जिला मजिस्ट्रेट के मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण में काम करता है, जबकि मेट्रोपोलिटन शहरों में डिप्टी कमिश्नर इंचार्ज होता है, इसकी मदद असिस्टेंट कमिश्नर करता है )
  • डीआईजीपी (एक राज्य के के तीन चार जिलों का इंचार्ज होता है )
  • आईजीपी या डीजीपी (राज्य स्तर के पुलिस प्रशासन का इंचार्ज होता है)

4. संघ शासित पुलिस प्रशासन :-

संघ शासित क्षेत्र में पुलिस प्रणाली की देखरेख केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी द्वारा किया जाता है । ये अधिकारी आईजीपी के सारे अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है ।



5. प्रथम सूचना रिपोर्ट(एफआईआऱ) :-

पुलिस थाने या चौकी में दर्ज की गयी ऐसी पहली अपराध की रिपोर्ट को प्रथम सूचना रिपोर्ट या एफआईआर कहा जाता है।
  • हर व्यक्ति अपने तरीके से अपराध के उस समय ज्ञात ब्योरे देते हुए रिपोर्ट लिखवा सकता है।
  • पुलिस इस एफआईआऱ को अपने रिकॉर्ड में दर्ज कर लेगी और पावती के रुप में एक प्रति रिपोर्ट दर्ज कराने वाले को देगी।
  • पुलिस सभी प्रकार के अपराधों की रिपोर्ट दर्ज करती है , लेकिन केवल संज्ञेय अपराधों के मामलों में ही पुलिस स्वयं जांच पड़ताल कर सकती है ।
  • असंज्ञेय अपराधों के मामलों में पुलिस पहले मामले को मजिस्ट्रेट को पेश करती है और उससे आदेश प्राप्त होने के बाद ही वह जांच-पड़ताल शुरु कर सकती है ।
  • अगर थाने में मौजूद पुलिस कर्मचारी/अधिकारी रिपोर्ट लिखने से मना कर दे तो शिकायतकर्ता उस क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक या उप पुलिस अधीक्षक को डाक से रिपोर्ट भेज सकता है ।
  • अगर रिपोर्ट लिखवाने वाला/वाली अनपढ़ हो तो ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी उसके बताए विवरण के मुताबिक उसकी ओर से रिपोर्ट लिखनी चाहिए और उसे पढ़कर सुनानी चाहिए।
  • ऐसी एफआईआर को सुनकर शिकायतकर्ता करने वाला/वाली रिपोर्ट पर अपने अंगूठे का निशान लगा सकता/सकती है।
  • अगर शिकायतकर्ता को लगता है कि रिपोर्ट में तथ्य ठीक नहीं लिखे गये हैं तो वह रिपोर्ट लिखने वाले पुलिस अधिकारी से आवश्यक संशोधन करने को कह सकता है ।




5. एफआईआर में निम्नलिखित विषय हों :-

  • अभियुक्त का नाम और पता हो
  • अपराध होने का दिन,स्थान तथा समय हो
  • अपराध करने का तरीका तथा उसके पीछे नीयत आदि हो
  • साक्षी का परिचय हो
  • अपराध से सम्बद्ध सभी विशेषताएं हों

6. परिवाद क्या है?

किन्ही व्यक्ति या व्यक्तियों (जानकार या अनजान) के विरुद्ध मौखिक या लिखित रुप में मजिस्ट्रेट को किया गया आरोप है ताकि मजिस्ट्रेट उनके विरुद्ध विधिक कार्यवाही कर सकें।
जब पुलिस अधिकारी एफआईआर के आधार पर कार्यवाही नहीं करता है, तब व्यथित व्यक्ति उस मजिस्ट्रेट को परिवाद कर सकता है , जिसे उस अपराध पर संज्ञान लेने की अधिकारिता है ।



7. आत्मरक्षा का अधिकार क्या है ?

हर व्यक्ति को आईपीसी की धारा 96 से लेकर धारा 106 द्वारा दिए गए अधिकार हैं कि वह अपने अथवा अन्य व्यक्ति के शरीर या संपत्ति की अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह के हमले से रक्षा करे।


8. गिरफ्तारी के कानून :-

पुलिस किसी भी व्यक्ति पर अपराध का आरोप होने पर ही उसे गिरफ्तार कर सकती है । केवल शिकायत अथवा शक के आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है ।


9. वारंट क्या है ?

वारंट न्यायालय द्वारा जारी किया गया तथा न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित आदेश है।
हर वारंट तब तक प्रवर्तन में रहेगा जब तक वह उसे जारी करने वाले न्यायालय द्वारा रद्द नहीं कर दिया जाता या जब तक वह निष्पादित नहीं कर दिया जाता है ।



10. जमानती वारंट क्या है? 

  • जमानती वारंट न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए जारी किया गया वारंट है, जिसमें यह पृष्ठांकित है कि जमानत की शर्तें पूरी करने के बाद उसे जमानत दी जा सकती है । इस मामले में पुलिस जमानत देने की हकदार है , अगर गिरफ्तार व्यक्ति शर्तें पूरी करे।


11. बिना वारंट के गिरफ्तारी :-

  • अभियुक्त पर संज्ञेय अभियोग हो या उसके खिलाफ ठोस शिकायत की गयी या ठोस जानकारी मिली हो या अपराध में उसके शामिल होने का ठोस शक हो,
  • अभियुक्त के पास सेंध लगाने का कोई औजार पकड़ा जाए और वह ऐसे औजार के अपने पास होने का समुचित कारण नहीं बता सके,
  • अभियुक्त के पास ऐसा सामान हो जिसे चोरी का समझा जाने के कारण हो अथवा जिस व्यक्ति पर चोरी करने या चोरी के माल खरीद-फरोख्त करने का शक करना वाजिब लगे।
  • अभियुक्त घोषित अपराधी हो ,
  • अभियुक्त किसी पुलिस अधिकारी के कर्तव्य पालन में बाधा पहुंचाए,
  • अभियुक्त पुलिस/कानूनी हिरासत से फरार हो जाए,
  • अभियुक्त के खिलाफ पक्का संदेह हो कि वह सेना का भगोड़ा है,
  • अभियुक्त छोड़ा गया अपराधी हो, लेकिन उसने फिर कानून तोड़ा हो,
  • अभियुक्त संदेहास्पद चाल-चलन का हो या आदतन अपराध करने वाला हो,
  • अभियुक्त पर असंज्ञेय अभियोग हो और वह अपना नाम-पता नहीं बता रहा हो।


12. गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट का वारंट :-

  • व्यक्ति को किसी भी मामले में गिरफ्तार करने के दौरान उसका अपराध तथा गिरफ्तारी का आधार बताया जाना चाहिए।
  • उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उस अभियोग पर उसे जमानत पर छोड़ा जा सकता है या नहीं ।
  • गिरफ्तारी के समय व्यक्ति पुलिस से वकील की मदद लेने की इजाजत मांग सकता है । उसके मित्र, संबंधी भी उसके साथ थाने तक जा सकते हैं ।
  • अगर व्यक्ति गिरफ्तारी का प्रतिरोध नहीं कर रहा हो तो गिरफ्तारी के समय पुलिस उससे दुर्व्यवहार नहीं कर सकती है, ना ही मारपीट कर सकती है ।
  • अगर वह पुराना अपराधी नहीं है या उसके हथकड़ी नहीं लगाने पर भाग जाने का खतरा नहीं है , तो गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को हथकड़ी नहीं पहनाई जा सकती है ।
  • अगर किसी महिला को गिरफ्तार किया जाना है , तो पुलिस का सिपाही उसे छू तक नहीं सकता है ।
  • गिरफ्तारी के तुरंत बाद व्यक्ति को थाने के प्रभारी अथवा मजिस्ट्रेट के पास लाया जाना चाहिए।
  • किसी भी स्थिति में , गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।( इसमें गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के पास लाए जाने का समय शामिल नहीं है)
  • किसी भी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना, 24 घंटे से ज्यादा समय तक पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।
  • गिरफ्तार व्यक्ति डॉक्टर द्वारा अपने शरीर की चिकित्सा परीक्षण की मांग कर सकता है ।


13. पुलिस हिरासत :-

  • अगर कोई पुलिसकर्मी हिरासत में किसी व्यक्ति को सताता है या यातना देता है तो उस व्यक्ति को पुलिसकर्मी की पहचान कर उसके खिलाफ आपराधिक आरोप दर्ज करने चाहिए
  • अगर हिरासत मे महिला के साथ बलात्कार तथा यौन संबंधी अन्य दुर्व्यवहार होता है तो उसे तुरंत डॉक्टरी जांच की मांग करनी चाहिए तथा मजिस्ट्रेट से शिकायत करनी चाहिए।
  • किसी महिला को केवल महिलाओं वाले लॉक अप में रखा जाना चाहिए।
  • अगर किसी थाने में ऐसी व्यवस्था नहीं है तो हिरासत में ली गयी महिला को मांग करनी चाहिए कि उसे ऐसे थाने में भेजा जाए जहां महिलाओं के लिए लॉक अप हो।



14. उच्चतम न्यायालय के निर्देश :-

  • गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी औऱ हिरासत में लिए जाने की सूचना अपने मित्र, संबंधी या किसी अन्य व्यक्ति को देने का अधिकार है ।
  • गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर थाने ले जाते समय उसे सूचना देने के अधिकार की अवश्य जानकारी देनी चाहिए
  • जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति ने अपनी गिरफ्तारी की जानकारी दी है , उसका नाम पुलिस डायरी में दर्ज किया जाना चाहिए।


15.अभियुक्त की डॉक्टरी जांच :-

  • एसआई रैंक या उसके ऊपर का पुलिस अधिकारी अदालत में दरख्वास्त देकर अभियुक्त का डॉक्टरी जांच करवा सकता है। ताकि उस डॉक्टरी सर्टिफिकेट को वह साक्ष्य के रुप में इस्तेमाल कर सके।
  • अभियुक्त स्वयं भी अपनी डॉक्टरी जांच के लिए अदालत को प्रार्थना-पत्र दे सकता है, ताकि वह साबित कर सके कि उसके साथ पुलिस द्वारा ज्यादती या मारपीट तो नहीं की गयी है।


16. महिला अभियुक्त के अधिकार :-

  • महिला पुलिस की ही हिरासत में रखने का अधिकार।
  • महिला डॉक्टर द्वारा ही डॉक्टरी जांच का अधिकार।
  • किसी अपराध में पूछताछ के लिए सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय के पहले किसी भी पुलिस स्टेशन में नहीं बुलाने का अधिकार।
  • किसी भी मामले में पूछताछ के दौरान महिला आरक्षी की उपस्थिति का अधिकार।
  • गिरफ्तार महिला को महिला आरक्षी से ही तलाशी का अधिकार।
  • घर की तलाशी के दौरान महिला अपराधी को घर से बाहर आने का समय पाने का अधिकार



17. जमानत का अधिकार :-

  • जमानत गिरफ्तार व्यक्ति को कुछ शर्तों पर पुलिस या न्यायिक अभिरक्षा से मुक्त करने की अनुमति है ।
  • अगर अपराध गैर-जमानती नहीं है तो पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत पर छोड़ना ही होगा।
  • अगर पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट पर्याप्त समझे तो व्यक्ति को निजी मुचलके या बंध-पत्र पर भी छोड़ा जा सकता है ।
  • जमानत और मुचलके पर रिहा व्यक्ति को जब भी अफसर या अदालत तलब करे, हाजिर होना होगा।

18. जमानतदार क्या होते हैं? :-

जमानतदार वे व्यक्ति होते हैं जो मुक्त किए गए व्यक्ति की आवश्यकतानुसार थाने या न्यायालय में उपस्थित प्रत्याभूत करते हैं । अगर मुक्त किया गया व्यक्ति पुलिस थाने या न्यायालय में उपस्थित नहीं होता है तो उसे वह रकम अदा करने के लिए समर्थ होना चाहिए, जिसके लिए वह जमानतदार है।


19. गैर-जमानती अपराध में अग्रिम जमानत :-

  • अगर किसी व्यक्ति को यह विश्वास है कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध के अभियोग में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह इस धारा के अधीन निर्देश के लिए उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को आवेदन कर सकता है। यदि न्यायालय ठीक समझे तो ऐसी गिरफ्तारी की स्थति में उसे जमानत पर छोड़ा जा सकता है ।
  • अग्रिम जमानत देने की शर्तें-
  1. वह व्यक्ति पुलिस अधिकारी द्वारा पूछे जाने वाले प्रति प्रश्नों का उत्तर देने के लिए जब भी जरुरत होगी, वह उपलब्ध होगा।
  2. वह उस मामले के तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को न्यायालाय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों को प्रकट ना करने के लिए मनाने के लिए, प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रुप से उसे कोई
  3. उत्प्रेरणा, मकी या वचन नहीं देगा।
  4. वह व्यक्ति ऩ्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना भारत नहीं छोड़ेगा।
  5. ऐसी अन्य शर्तें, जो धारा 437 की उपधारा (3) के अधीन ऐसे अधिरोपित की जा सकती हैं मानो उस धारा के अधीन जमानत मंजूर की गयी है ।
  • ऐसे अभियोग पर पुलिस थाने में पुलिस अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तारी के समय या जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है, तब किसी समय जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जायेगा। यदि ऐसे अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम बार ही वारंट जारी किया जाना चाहिए तो वह उपधारा (क) के अधीन न्यायालय के निर्देश के अनुरुप जमानती वारंट जारी करेगा। अदालत मुकदमों के विभिन्न पहलुओं को देखते हुए शर्तों या बिना शर्त के अग्रिम जमानत मंजूर या नामंजूर कर सकती है।

20. पुलिस की जांच :-

  • अपराध की जांच के दौरान पुलिस आपसे पूछताछ करे तो आपको अपनी जानकारी की बातें सही-सही बताते हुए पुलिस के साथ सहयोग करना चाहिए।
  • संभव हो तो आपको अपराध का सुराग भी पुलिस को देना चाहिए और जुबानी पूछताछ का उचित जवाब देना चाहिए।
  • आपके लिए न तो किसी लिखित बयान पर दस्तखत करना जरुरी है, न ही आपको वे सब बातें लिखकर देनी होती हैं जो आपने जुबानी बताई हैं ।

21. पुलिस की पूछताछ :-

  • अभियुक्त को पूछताछ के दौरान पुलिस से सहयोग करना चाहिए।
  • अभियुक्त को सावधान भी रहना चाहिए कि पुलिस उसे झूठे मामले में न फंसाए।
  • अभियुक्त को किसी कागज पर बिना पढ़े अथवा उसमें लिखी बातों से सहमत हुए बिना हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए।
  • किसी महिला और 15 साल से छोटे पुरुष को पूछताछ के लिए घर से बाहर नहीं ले जाया जा सकता है । उनसे घर पर ही पूछताछ की जा सकती है ।
  • व्यक्ति मजिस्ट्रेट से अनुरोध कर सकता है कि उससे पूछताछ का उचित वक्त दिया जाए।
  • पूछताछ के दौरान व्यक्ति ऐसे किसी सवाल का जवाब देने से मना कर सकता है , जिससे उसे लगे कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला बनाया जा सकता है ।
  • व्यक्ति पूछताछ के दौरान कानूनी या अपने किसी मित्र की सहायता की मांग कर सकता है और आम तौर पर ऐसी सहायता की मांग पुलिस मान लेती है।

22. तलाशी के लिए वारंट :-

  • अदालत या मजिस्ट्रेट के तलाशी वारंट के बिना पुलिस किसी के घर की तलाशी नहीं ले सकती है ।
  • आमतौर पर चोरी के सामान, फर्जी दस्तावेज, जाली मुहर, जाली करेंसी नोट, अश्लील सामग्री तथा जब्तशुदा साहित्य की बरामदगी के लिए तलाशी ली जाती है ।
  • पुलिस अधिकारी को तलाशी के स्थान पर मौजूद संदिग्ध व्यक्तियों और वस्तुओं की तलाशी लेने देनी चाहिए।
  • तलाशी और माल की बरामदगी इलाके के दो निष्पक्ष तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में की जानी चाहिए।
  • पुलिस को जब्त सामान की ब्योरा देते हुए पंचनामा तैयार करना चाहिए। इस पर दो स्वतंत्र गवाहों के भी हस्ताक्षर होने चाहिए और इसकी एक प्रति उस व्यक्ति को भी दी जानी चाहिए जिसके घर/इमारत की तलाशी ली गयी हो।
  • तलाशी लेने वाले अधिकारी की भी , तलाशी शुरु करने से पहले , तलाशी ली जा सकती है ।
  • कोई पुरुष किसी महिला की शारीरिक तलाशी नहीं ले सकता है, लेकिन वह महिला के घऱ या कारोबार के स्थान की तलाशी ले सकता है ।

23. न्यायालय का समन :-

  • समन न्यायालय द्वारा जारी लिखित आदेश है । जिसके द्वारा न्यायालय किसी विवाद या आरोप से संबद्ध प्रश्नों का उत्तर देने के लिए किसी व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थिति होने के लिए बाध्य कर सकता है ।
  • अगर व्यक्ति समन स्वीकार करने से मना करे या न्यायालय के समक्ष अनुपस्थित हो तो न्यायालय गिरफ्तारी का वारंट जारी कर सकता है ।

24. कार्य विशेष परिस्थिति में किए गए कार्य दण्डनीय नहीं :-

  • सात वर्ष से कम उम्र के बालक द्वारा किया गया कोई कार्य।
  • सात वर्ष से बारह वर्ष के बीच की उम्र के बालक द्वारा किया गया कोई कार्य, यदि उसने वह विशेष परिस्थिति में या नासमझी, अज्ञानता में किया है।
  • विकृत चित्त वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य।
  • नशे में रहने वाला व्यक्ति, जिसने अपनी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य किया हो।
  • किसी व्यक्ति द्वारा धमकी के अंतर्गत किया गया कार्य ।
  • सहमति तथा सक्षमता से किया गया कार्य ।
  • किसी न्यायिक पदाधिकारी द्वारा उक्त पद पर किया गया कार्य।
  • अपनी रक्षा के लिए कुछ अपवादों के साथ किया गया कार्य।

25. जानबूझकर किए गए दण्डनीय कार्य :-

  1. किसी अभियुक्त को शरण देना।
  2. किसी पर गलत आरोप लगाना या झूठी गवाही देना।
  3. किसी अभियुक्त को छिपाना या साक्ष्य को खत्म करना।
  4. जाली सिक्का नोट अपने पास रखना।
  5. लोकसेवक के कार्य में बाधा डालना।
  6. सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलना।
  7. किसी भी धर्मस्थान को उसकी अवमानना हेतु अपवित्र करना।
  8. दूसरों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाले शब्दों का इस्तेमाल करना।
  9. बिना लाइसेंस के आग्नेय अस्त्र या विस्फोटक पदार्थ रखना।

26. जानिए निर्वाह भत्ते से जुड़े कुछ कानून :-

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 से 128 तक उन प्रावधानों का उल्लेख किया गया जिसके आधार पर किसी भी व्यक्ति को ..उसके आश्रितों को निर्वाह खर्चा / गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य किया जा सकता है। दरअसल इस कानून के पीछे अवधारणा ये है की प्र्तात्येक व्यक्ति का ये मौलिक और नैतिक कर्त्तव्य है की वो अपनी पत्नी, बच्चों, माता-पिता, अभिभावकों की देखभाल करे..यदि वे अपनी देखभाल करने में असमर्थ हैं तो .... इसके पीछे विचार ये है की कोई भी माता-पिता, पत्नी, और संतान इन हालातों में मजबूर हो कर न रहे की ..विवश होकर वो अपराध ..में ही लिप्त हो जाए..या किसी और का मोहताज बन जाए।

धारा 125 के अनुसार कोई सक्षम व्यक्ति उनका भरण-पोषण करने में आनाकानी करता है:

1। उसकी पत्नी, जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो ...
2। उस व्यक्ति की वैध / अवैध अवयस्क ... विवाहित / अविवाहित संतान ..जो अपना निर्वाह करने में अक्षम हो ...
3। उस व्यक्ति की वैध / अवैध संतान (विवाहित पुत्री नहीं) जो बालिग़ तो हैं, ... किन्तु किसी भी तरह की शारीरिक, मानसिक, अक्षमता से ग्रस्त हो .....
4। उसके माता -पिता, जो अपनी देखभाल करने में अक्षम हों ....

तो उस स्थिति में ..प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी उस व्यक्ति को ये आदेश दे सकती है की वो एक निश्चित राशि, प्रति माह, उन्हें गुजारा भत्ते के रूप में अदा करे ...
इसके तहत वर्ष 2001 में शंशोधन करके ये कानून भी बना दिया गया की अदालत धारा 125 की याचिका की सुनवाई करते हुए ..एक निश्चित राशि को अंतरिम खर्चे / राहत के रूप में निर्धारित करके उस व्यक्ति को उसके भुगतान का आदेश दे सकती है .. जब तक की उस याचिका का निपटारा नहीं हो जाता.और ये अंतिम खर्चे का निर्धारण मुदालय को याचिका प्राप्त होने के साठ दिनों इके अन्दर अन्दर कर दिया जाना चाहिए ....



27. जानिए विवाह से सम्बंधित कुछ अपराधों को :-

आज के अंक में जानते हैं की भारतीय कानून में विवाह से सम्बंधित भी कुछ अपराध वर्णित हैं ... वो कौन कौन से हैं..किस तरह के हैं और उनमें कितनी सजा का प्रावधान है..आदि आदि ...

भारतीय दंड संहिता की धारा 4 9 3 के अनुसार कोई भी व्यक्ति, किसी भी महिला से, जो की कानूनी रूप से उसकी पत्नी नहीं है, मगर समझती है की वो उस व्यक्ति की विवाहिता है, यदि, उस महिला के संसर्ग में (शारीरिक रिश्ते) आता है तो वो दंड का भागी बँटा है, क्यूंकि ये कानूनन जुर्म है। इस धारा के अनुसार दो तथ्यों की अपरिहार्यता होती है ..

.पहली ये की कानूनन वैध शादी का धोखा होना।
.और दूसरा इस धोखे में ही संसर्ग होना।

इस जुर्म के लिए सिद्ध ये करना होग की आरोपी व्यक्ति ने उस महिला को jaanboojh कर उसे इस धोखे में रखा की वो कानून उसकी वैध पत्नी है ... और इसी विश्वास के तहत ही उसके साथ संसर्ग स्थापित किया गया

ये अपराध .गैर संज्ञेय, गैर जमानती तथा गैर कम्पौंदेबल है..और कानून के अनुसार इसमें दस वर्षों की सजा और जुर्माने का प्रावधान है

बहु-विवाह: -

दंड संहिता की धारा 494 के भारतीय अनुसार कोई भी व्यक्ति यदि अपने Jivan साथी के जीवित होते हुए दूसरा विवाह kartaa है तो उसे बहु विवाह का दोषी माना जाएगा। इस अपराध के लिए उसे सात वर्षों की सजा हो सकती है। मगर इस कानून से जुड़े कुछ महतवपूर्ण तथ्यों का जिक्र आवश्यक हो जाता है .. ये कानून मुस्लिम धर्म के अनुयायीं (सिर्फ पुरुषों) पर लागु नहीं होता क्यंकि शरीयत काननों के अनुसार उन्हें इसकी इजाजत मिली हुई है, है कानून के बावजूद दो स्थितियों में ये अपराध नहीं माना जाएगा।

यदि किसी न्यायालय द्वारा उस विवाह को कानूनी मान्यता दे दी है ....
उस स्थिति में भी जब पहले पति या पहली पत्नी का ,, .. सात वर्षों तक कोई अता -पता न चले ..
सबसे महत्वपूर्ण बात ये की ,, कानून की नजर में दूसरी पत्नी और doosre पति को..भी वो सारे अधिकार प्राप्त हैं तो ... बशर्ते की विवाह वैध हो। (। वैध और अवैध / अपूर्ण विवाह पर चर्चा फिर कभी)

28. दुर्घटना क्लेम करना हो तो :-

इस तेज़ गति से आधुनिक होते युग में अन्य सुविधाभोगी साधनों की तरह अपने वाहनों का उपयोग भी अनिवार्य सा हो गया है. और ये भी सच है की जितने अधिक वाहन बढ़ रहे हैं, दुखद रूप से दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं. छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरों तक में सड़क दुर्घटनाओं की दर में बेतहाशा वृद्धि हो रही है. विशेषकर दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में तो इन सड़क दुर्घटनाओं ने एक बड़ी समस्या का रूप ले लिया है. यही वजह है की दृघतना में आहात लोगों एवं उनके आश्रितों के लिए मुआवजे हेतु ,विशेष मोटर वाहन दुर्घटना क्लेम पंचाट का गठन किया गया है,जिसमें न्यायादेहीश दुर्घटना क्लेम संबन्धी दावों का निपटारा करते हैं. यहाँ ये स्पष्ट कर दें की किसी दुर्घटना के बाद पुलिस एक आपराधिक मुकदमा तो दर्ज करती ही है जो चालाक या सम्बंधित चालकों के विरुद्ध दर्ज किया जाता है. दूसरा मुकदमा पीड़ित पक्ष को या उसके आश्रित को डालना होता है. रेलवे दुर्घटना से सम्बंधित दावों और वादों के लिए ऐसे ही विशेष पंचाट अलग से बनाये गए हैं.

आइये उन बातों को जानते हैं जो किसी को भी दुर्घटना क्लेम का दावा डालते समय ध्यान में रखनी चाहिए . यहाँ ये बता दें की दुर्घटना क्लेम वाद में एक पक्ष या तो पीड़ित स्वयं होता है या दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाने पर उसके वैध आश्रित होते हैं और दुसरे पक्ष में वाहन का चालाक , वाहन का मालिक तथा वाहन का इन्सुरेंस होने की स्थिति में इन्सुरेंस कंपनी होती है. दुर्घटना होते ही पुलिस अपना कार्य शुरू कर देती है,. आपराधिक मुकदमा दर्ज करना, गवाहों के बयान कलमबंद करना आदि. यूँ तो प्राथमिक सूचना रिपोर्ट तथा सम्बंधित कागजातों की एक प्रति पुलिस द्वारा सम्बंधित पक्षों एवं पीडितों को उपलब्ध कराई जाती है, किन्तु स्वयं उसे हासिल करके संभाल कर रखना चाहिए. दुर्घटना के पश्चात् पीड़ित व्यक्ति तथा सम्बंधित लोग मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक रूप से परेशान होते हैं...आजकल एक प्रवृत्ति जो विवादित होने के बावजूद चलन में है वो है की दुर्घटना के कुछ समय या दिनों के पश्चात् ही कोई वकील या उसकी तरफ से कोई व्यक्ति पिसित परिवार से मिलता है और भरी भरकम मुआवजा राशि दिलवाने का आश्वासन देकर आनन-फानन में मुकदमा डालने को प्रेरित करता है. जो अधिकांशतः गलत साबित होता है. इसलिए अच्छा ये होता है की जल्दबाजी में कोई कदम न उठाया जाए.

दुर्घटना क्लेम पंचाट किसी विवाद या दावे का निपटारा कैसे करता है , क्या मापदंड अपनाया जाता है , इसकी कार्यशैली क्या होती है .इसकी चर्चा से कोई भी ये आसानी से समझ सकता है की उसको क्या और कैसे करना है..और ये भी कितनी राशि का दावा करना चाहिए.. दरअसल पंचाट दो मुख्या क्षेत्रों पर सुनवाई करता है, वैसे दुर्घटना दावे जिनमें पीड़ित व्यक्ति जीवित होता है तथा अपने दावे का अहम् गवाह और लाभार्थी भी वही होता है. दुसरे वे दावे , जिनमें दुर्घटना के समय किसी की मृत्यु हो जाती है और मुकदमा उसके आश्रितों एवं वैध उत्तराधिकारियों द्वारा डाला जाता है. हलाँकि दोनों तरह के वादों का निपटारा लगभग एक जैसे ही किया जाता है मगर कुछ विशेष बातों का अंतर तो होता ही है...


29. दुर्घटना क्लेम करना हो तो :-

दावाकार या वादी स्वयं पीड़ित व्यक्ति ही होता है तो पंचाट उसी की गवाही, उसी के द्वारा उपलब्ध साक्ष्य एवं कागजातों को आधार मानकर दावे का निपटारा करता है। ऐसे दावों में पंचाट पीड़ित व्यक्ति को चार विभिन्न मदों में भुगतान करने का आदेश प्रतिवादी को देती है। इलाज, यात्रा भत्ता, पोषाहार देतु तथा प्रभावित दिवसों में हुए आय का नुकसान .इसलिए पीड़ित व्यक्ति को चाहिए वो इलाज से सम्बंधित प्रत्येक कागज़ .दवाइयों की रसीद, अस्पताल आने जाने, रहने में लगे खर्चे की रसीदें तथा तथा पोषाहार हेतु लिए गए विशेष भोज्य पदार्थों पर हुए खर्च का सारा ब्यौरा संभाल कर रखे एवं गवाही के समय अदालत में उपस्थित करे।

दूसरी स्थिति में जब दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके वैध आश्रित / उत्तराधिकारी द्वारा दुर्घटना क्लेम करने में पंचाट कुछ विशेष बातों का ध्यान रखती है। सबसे पहली तो ये की दावा करने वाला मृतक का वैध आश्रित / उत्तराधिकारी है। ये दोनों बातें यानि मृतक से दवाकार का सम्बन्ध तथा वैध उत्तराधिकारी / आश्रित होने का प्रमाण, दोनों ही दावा करने वाले व्यक्ति को पंचाट में saabit karnee होती है। यानि पंचाट को संतुष्ट करना होता है। मृत व्यक्ति वाले दावों में भी पंचाट कुछ विशेष मदों में मुआवजा राशिः भुगतान का आदेश देती है। मृतक के अंतिम संस्कार पर किये गए खर्च जो की सामान्यतया दो हजार रुपया दिया जाता है। मृतक के परिवारवालों को हुई मानसिक परेशानी एवं आघात के मद में जो की सामान्यतया पच्चीस हजार रुपये होता है। तथा तीसरा एवं सबसे अहम् मृतक के परिवार को उस मृतक के चले जाने से हुई आर्थिक हानि।
मैं
यहाँ ये बता दें की आर्थिक हानि हेतु पीड़ित या मृत व्यक्ति की आयु, uskee मासिक आय, रहन सहन पर किया जा रहा खर्च आदि सभी तथ्यों का गणितीय विश्लेषण करने के उपरांत ही मुआवजा राशिः तय की जाती है। एक अहम् बात मृतक से सम्बंधित दावे में पंचाट अंतरिम मुआवजा का आदेश भी देती है। ऐसा ही अंतरिम मुआवजा उस दुर्घटना क्लेम में भी दिया जाता है jismein पीड़ित व्यक्ति को मान्यताप्राप्त मेडिकल बोर्ड द्वारा स्थाई अपंगता का प्रमाणपत्र दिया गया है। हाँ, इसमें मुआवजे की राशि इसमें आम तौर पर पच्चीस हज़ार ही होती है।

पंचाट द्वारा मुआवजे राशि का भुगतान का आदेश भी एक विशेष व्यवस्था द्वारा किया जाता है। सामान्यतया कुल देय राशिः का अधिकतम बीस से पच्चीस प्रतिशत ही आदेश के तुंरत बाद भुगतान किया जाता है। शेष राशिः को पंचाट के आदेशानुसार नामित व्यक्तियों के नाम से बैंक में फिक्स दीपोजित करा दिया जाता है जो परिपक्वता के बाद उन्हें मिलता है। किसी अनिवार्य परिस्थिति में उक्त राशि को जारी करने हेतु प्रार्थनापत्र पंचाट में लगाया जा सकता है।

इसके अलावा कुछ और बातें भी ध्यान देने योग्य हैं। यदि दुर्घटना के समय चालाक के पास उक्त वाहन को चलाने का वैध लाईसेंस नहीं है तो मुआवजे के भुगतान का सारा Jimma वाहन के मालिक के ऊपर पड़ जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे इंश्योरेंस की शर्तों का उल्लंघन होता है। ऐसी दुर्घटनाएं जिनमें चश्मदीद गवाह नहीं होते उनमें 163 (क) के तहत कार्यवाई आगे बधाई जाती है। यानि कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है की एक विशेष कार्य पधात्ति के बावजूद मुआवजे की राशि बहुत कुछ वादी की स्थिति, आयु, और आय पर निर्भर करती है ...


आखिर में ,

दोस्तों आज की हमारी Post आपको कैसे लगी और यह आपके कितने परसेंट काम आयी है हमे कमेंट बॉक्स में जरूर बताना और साथ में अपने दोस्तों को यह पोस्ट सोशल मीडिया जैसे:- Instgaram , Facebook , Twitter आदि पर शेयर कर सकते है जिससे आपके मित्रो को भी जनरल नॉलेज की जानकारी हो 

कोई टिप्पणी नहीं:

Bottom Ad [Post Page]

| Designed by Colorlib